Jigyasa Week2 Hindi L2 L3 Story
📖 कहानी – “बावड़ी का रहस्य”
बरसात की एक नम सुबह थी। बड़ेगांव के स्कूल के बरामदे में बच्चे खड़े-खड़े बारिश की बूँदें गिन रहे थे। मिट्टी की महक इतनी गहरी थी कि सबका मन पढ़ाई से ज़्यादा खेल में लग रहा था।
देवांश अचानक बोला, “अरे सुनो! मेरी दादी ने कहा था कि खापा के पास एक बहुत पुरानी बावड़ी है। कहते हैं उसमें पानी के साथ-साथ कहानियाँ भी रहती हैं।”
डिंपल खिलखिलाई, “बावड़ी में कहानियाँ? अरे बावड़ी क्या किताब है?”दिपांशु ने आँखें चौड़ी कर लीं, “अगर मैं उसमें कूद जाऊँ तो कोई जिन्न निकलेगा और बोलेगा – ‘बचाओ, मुझे छुट्टी चाहिए!’” सब बच्चे ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे।
शौर्य ने गंभीर चेहरा बनाकर कहा, “चुप रहो सब! बावड़ी में नागराज सोता है, यही मेरी नानी कहती हैं।”
“नागराज नहीं, परियों की रानी,” जानवी ने डाँटते हुए कहा। “मेरी दादी कहती हैं कि रात को परियाँ नीचे उतरकर गीत गाती हैं “ l लीला आचार्या अब तक चुपचाप बच्चों की बातें सुन रही थीं। वह मुस्कुराते हुए बोलीं, “आज की कक्षा बरामदे में नहीं होगी। तुम सब अपनी आँखों से देखोगे कि यह बावड़ी कैसी है।”
रास्ते की शरारतें
सभी बच्चे आचार्या के साथ कीचड़ भरे रास्ते पर चल पड़े। छाते टेढ़े-मेढ़े हो रहे थे, किसी के पैर फिसल रहे थे, कोई गड्ढों में छपाक कर रहा था।
शौर्य हर पानी के गड्ढे में कूदता और कहता, “ये मेरी अकेले की झील है!”
श्रेयश बार-बार गिरकर उठता और चिल्लाता, “ये ज़मीन ही मुझसे प्यार करती है!”
तन्मय ने अचानक भुट्टे की गंध सूँघी और बोला, “अगर बावड़ी न मिली तो भुट्टा तो ज़रूर मिलेगा!”
सब फिर से हँस पड़े।
झाड़ियों के पीछे का रहस्य
थोड़ा आगे बढ़ने पर झाड़ियों के पीछे पत्थर की सीढ़ियाँ दिखाई दीं। सीढ़ियाँ नीचे अँधेरे में जाती थीं और ठंडी हवा ऊपर उठ रही थी।
“यही है बावड़ी,” लीला आचार्या ने धीरे से कहा। “इसे देखो, हमारे पूर्वजों की मेहनत अब भी साँस ले रही है।”
बच्चों की आँखें चौंधिया गईं। दीवारों पर नक्काशी, काई की गंध, और टर्र-टर्र करती मेंढकों की आवाज़ गूँज रही थी।गौरव ने धीरे से कानाफूसी की, “कहीं यहाँ सच में कोई नागराज तो नहीं?” डिंपल ने डराने के अंदाज़ में कहा, “या परियों की रानी!” अचानक हार्दिक फिसलकर सीढ़ियों पर बैठ गया। सब घबराए, लेकिन वह खुद ही बोला, “अब मैं बावड़ी का पहरेदार हूँ। जो चाहे सिक्का फेंककर मुझसे अर्जी दो!”
बच्चों की हँसी बावड़ी की गूँज से मिलकर पूरे जंगल में फैल गई।
टंकी और तालाब की झलक
वहीं पास में टूटी-फूटी पत्थर की टंकी पड़ी थी। चैतन्य ने कहा, “अरे, ये तो हमारे गाँव की पुरानी पानी की अलमारी होगी!”
हर्षित बोला, “हाँ, इसमें पानी रखा जाता होगा जैसे दादी अनाज की बोरियों में रखती हैं।”
। सभी ने मिलकर झाँका। टंकी खाली थी, पर दीवारों पर पानी की लकीरें बताती थीं कि बरसों पहले यह भरी रहती होगी।थोड़ी दूर जाने पर बच्चों को तालाब दिखा। किनारों पर घास उगी थी। रुद्राक्ष ने पत्थर उठाकर पानी में फेंका—छपाक!
“यह हमारा गाँव का तैराकी ताल है,” उसने गर्व से कहा।
लौटते समय की सोच
वापस लौटते समय शौर्य ने अचानक पूछा, “अगर पहले इतना पानी जमा होता था, तो अब कुएँ क्यों सूख जाते हैं?”
लीला आचार्या ने बच्चों की तरफ देखा, “क्योंकि हमने पुरानी चीज़ों को सँभाला नहीं। बावड़ी भर गई मिट्टी से, तालाब गंदगी से। अब हमें सोचने की ज़रूरत है कि कैसे हम फिर से पानी बचा सकते हैं।”। जानवी बोली, “तो क्या हम सब मिलकर सफाई कर सकते हैं?”
“हाँ, क्यों नहीं!” लीला आचार्या ने कहा। “अगर बच्चे चाहें तो हर बड़ी चीज़ बदल सकते है।”
कहानी का असर
बरसात की बूँदें अब फिर से तेज़ होने लगीं। बच्चे बावड़ी के पास खड़े होकर आसमान की तरफ देखने लगे।
दिपांशु ने मुस्कराते हुए कहा, “लगता है बादल भी हमारे साथ वादा कर रहे हैं कि अगर हम मेहनत करें तो पानी कभी कम नहीं होगा।”
बच्चों ने खिलखिलाकर ताली बजाई। हँसी, फुहार और मिट्टी की खुशबू—सब मिलकर वह सुबह यादगार बना गए।
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